रविवार, 21 मार्च 2010

आज रूस के उस कवि की कविताएँ प्रस्तुत करना चाहता हूँ जिसे सिर्फ़ इसलिए मौत का मुँह देखना पड़ा क्योंकि उसने अपने देश के तानाशाह शासक की अपनी कविता में खिल्ली उड़ाई थी। ओसिप मंदेलश्ताम ऐसे ही कवि थे। उन्हें उनकी कविता के कारण बार-बार गिरफ़्तार किया गया और फिर एक ऐसे यातना-शिविर में झोंक दिया गया, जहाँ कुछ ही हफ़्तों में वे मर गए। उनकी लाश को यातना शिविर के कैदियों की एक सामूहिक क़ब्र के गड्ढे में डाल कर दफ़ना दिया गया। सिर्फ़ उनके पाठकों की ज़ुबान पर उनका नाम और उनकी 352 कविताएँ हमारी इस दुनिया में बाक़ी रह गईं। अपनी इन कविताओं के आधार पर ही उनका नाम आज रूस के प्रमुख महाकवियों में से एक माना जाता है। प्रस्तुत हैं उनकी कुछ कविताएँ :

1.

चांद पर
जन्म नहीं लेती
एक भी गीत-कथा

चांद पर
सारी जनता
बनाती है टोकरियाँ

बुनती है पयाल से
हल्की-फुल्की टोकरियाँ

चांद पर
अंधेरा है
उसके आधे हिस्से में

और शेष में
घर हैं साफ़-सुथरे

नहीं, नहीं
घर नहीं हैं चांद पर
सिर्फ़ कबूतरख़ाने हैं

नीले-आसमानी घर
जिनमें रहते हैं कबूतर

(रचनाकाल : 1914)

2.

कुछ भी कहने की ज़रूरत नहीं
कुछ सीखने की भी ज़रूरत नहीं
बहुत उदास है पर है भली-भली
उसकी वहशियाना आत्मा काली

कुछ सीखना वह चाहती नहीं
और ख़ुद कुछ कह पाती नहीं
तैर रही है युवा डेल्फ़िन-सी
दुनिया के प्राचीन भँवर में ही

(रचनाकाल : 1909)

3.

मुझे दिया गया शरीर, मैं क्या करूँ इसका
जितना बेजोड़ यह मेरा है और भला किसका ?

इस शान्त ख़ुशी, इन साँसों और जीवन के लिए
किसका शुक्रिया अदा करूँ मैं, बताओ प्रिय ?

मैं ख़ुद ही माली हूँ और मैं ही तो हूँ बग़ीचा,
दुनिया के इस अंधेरे में, सिर्फ़ मैं ही नहीं हूँ रीता ।

अमरत्व के इस काँच पर, ऎ फकीर !
लेटी हुई है आत्मा मेरी और शरीर ।

इस काँच पर ख़ुदे हुए हैं कुछ बेलबूटे ऎसे,
पहचानना कठिन है जिन्हें पिछले कुछ समय से ।

समय की गन्दी धारा यह बह जाने दो
ख़ुदे हुए इन प्रिय बेलबूटों को रह जाने दो ।

(रचनाकाल : 1909)

4.

भय देखे हमने बहुतेरे
बड़बोले ओ साथी मेरे!

ओह! छूटे खैनी की फँक्की
मूर्ख है तू सनकी है झक्की!

गूँजे यदि जीवन, कूके मयूरी
खाने को मिलते तब हलवा-पूरी

पर लगता है रह जाएगी अब
यार तेरी यह चाहत अधूरी

(रचनाकाल : अक्तूबर 1930, तिफ़लिस)

5.

मुझ से
समुद्र छीन कर

छीन कर
दौड़ और उड़ान

मेरी एड़ियों को
बलपूर्वक
ज़मीन में ठोंककर

आपको क्या मिला ?


आपने
हिसाब पूरा कर लिया
शानदार ढंग से

पर
मेरे फड़फड़ाते होंठ
मुझ से
आप छीन नहीं पाए

(रचनाकाल : 1935)

6.


कितना धीमे
चल रहे हैं घोड़े
लालटेन की रोशनी कितनी कम है
शायद ये अजनबी
जानते हैं ये बात
कहाँ ले जा रहे हैं मुझे वे इस रात

मेरी चिन्ता
अब उनको ही करनी है
मुझे तो नींद आ रही है
मैं सोना चाहता हूँ
शायद पहुँच गया हूँ उस मोड़ पर
जहाँ बन जाऊंगा मैं किसी तारे की रोशनी

सिर मेरा गर्म है
चक्कर आ रहे हैं
कोई अजनबी कोमल हाथ
मुझे छू रहा है
दिखाई दे रहे हैं मुझे
फर-वृक्षों के काले आकार
जिन्हें पहले नहीं देखा कभी मैंने
ऎसे कुछ धुंधले उभार

(रचनाकाल : 1911)

1 टिप्पणी:

Alpana ने कहा…

Anilji. aapako is blog jaise nek kaam par badhaai. Chekhov kee kahaanee ko hindi mein padh kar bahut achchhaa lagaa. aese hee likhate rahiye.