बुधवार, 21 अक्तूबर 2015



कर्नेय चुकोवस्की

कर्नेय चुकोवस्की का नाम रूस में बच्चा-बच्चा जानता है। जब से उनकी रचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं  में छपनी शुरू हुईं, तभी से रूस की हर नई पीढ़ी के बच्चे इनकी कविताएँ और बाल-कथाएँ पढ़ते और उनका आनन्द लेते हैं। कर्नेय चुकोवस्की रूसी बाल-साहित्य के कालजयी रचनाकार माने जाते हैं। इसके अलावा उन्हें रूसी साहित्य में आलोचक के रूप में भी याद किया जाता है।



कर्नेय चुकोवस्की का जन्म 1882 में रूस के साँक्त पितेरबुर्ग नगर में हुआ था। उनकी माँ येकतिरीना असिपव्ना कर्नेयचुकवा एक उक्राइनी किसान स्त्री थी जो पितेरबुर्ग के एक यहूदी परिवार में नौकरानी थी। इस परिवार के नौजवान बेटे एम्मानुईल ने उसे अपनी रखैल बना लिया था।  जब येकतिरीना के बेटे कर्नेय का जन्म हुआ तब एम्मानुईल से ही जन्मी उसकी बड़ी बेटी तीन साल की हो चुकी थी। पुत्र के जन्म के कुछ समय बाद एम्मानुईल ने एक उच्च परिवार की लड़की से विवाह कर लिया और येकतिरीना अपने बच्चों को लेकर अदेस्सा चली गई।


यहाँ दोस्तो, हम आपको यह बताना चाहेंगे कि रूस में सभी लोगों का नाम तीन अंशों में बँटा होता है – पहला अंश उस व्यक्ति को उसके जन्म के समय दिया गया उसका अपना मूल नाम होता है। दूसरा अंश उस पैतृक नाम का होता है जो यह बताता है कि यह व्यक्ति किस पिता की संतान है और तीसरा व अन्तिम अंश व्यक्ति का कुलनाम होता है। उदाहरण के लिए-- येकतिरीना
असिपव्ना कर्नेयचुकवा में येकतिरीना कर्नेय की माँ का अपना नाम है, असिपव्ना उनका पैतृक नाम है जिसका अर्थ है कि येकतिरीना ओसिप की बेटी है। उनकी बेटी और बेटे को जो जन्म पंजीकरण प्रमाणपत्र मिले थे उनमें उनकी सन्तानों के अवैध होने के कारण पैतृक नाम की पंक्ति खाली रखी गई थी। बेटे का पहला नाम था निकलाय और कुलनाम माँ के कुलनाम पर कर्नेयचूकफ़।

लेखन की दुनिया में कदम रखते हुए निकलाय कर्नेयचूकफ़ ने अपना साहित्यिक उपनाम रख लिया-- कर्नेय चुकोवस्की। कालान्तर में इसमें काल्पनिक पैतृक नाम इवानोविच (इवान का बेटा) भी जुड़ गया। 1917 की प्रसिद्ध समाजवादी क्रान्ति के बाद सभी दस्तावेज़ों में यही उनका आधिकारिक नाम बन गया और अब सारी दुनिया उन्हें इसी नाम से जानती है। उनके बच्चों ने भी उनका यही कुलनाम ग्रहण किया। 


सदा ठण्ड से ठिठुरते पितेरबुर्ग नगर के विपरीत  काला सागर के तट पर बसे बन्दरगाह नगर अदेस्सा में जीना आसान था। किन्तु परिवार एक तो गरीब था, ऊपर से अवैध सन्तान होने का कलंक बालक निकलाय के लिए मानसिक यातना बना हुआ था। कर्नेय चुकोवस्की अपने संस्मरणों में लिखते हैं -- मुझे पिता या कम से कम दादा-नाना जैसी सम्पदा पाने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ।  इसलिए निकलाय अपने हमउम्र साथियों के साथ मुश्किल से ही दोस्ती बना पाता था। लेकिन दोस्तों की कमी पुस्तकें पूरी कर देती थीं। दिन में पार्क में बेंच पर बैठकर, और रात को सड़क के किनारे लगे बत्ती के खम्भे तले खड़े होकर निकलाय  किताबें पढ़ता रहता था। कितनी ही कविताएँ उसे कण्ठस्थ थीं। बचपन से ही उसमें अँग्रेज़ी भाषा सीखने की ललक थी। कहीं से उसे   ’ख़ुद अँग्रेज़ी सीखो’ नाम की एक किताब मिल गई और वह अँग्रेज़ी सीखने में जुट गया। 1962 में ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में डी०लिट् की डिग्री पाते हुए चुकोवस्की ने अपने बचपन के वे दिन याद किए, जब वह ’अँग्रेज़ी के शब्दों का रट्टा लगाया करता था। उस ज़माने में सभी बच्चे यह सपना देखा करते थे कि किसी न किसी दिन वे आस्ट्रेलिया या भारत पहुँच जाएँगे।  निकलाय की माँ ने किसी तरह बेटे को एक स्कूल में  दाखिल करवा दिया था। लेकिन कुछ साल बाद ही उसे वहाँ से यह कहकर  निकाल दिया गया कि  यह स्कूल नीच क़िस्म के लोगों के लिए नहीं है।
 
रोज़ी-रोटी कमाने के लिए चुकोवस्की ने छोटी उम्र में ही काम शुरू कर दिया था। पढ़ने में दिलचस्पी थी ही, सो उन्होंने अख़बारों में भी काम ढूँढ़ा और धीरे-धीरे पत्रकारिता में अपने पाँव जमा लिए। रिपोर्ताज लिखना, लोगों से इण्टरव्यू लेना, लेख लिखना – यह सब उनका काम था। 1901 में चुकोवस्की ‘अदेस्स्कीये नोवस्ती’ अर्थात अदेस्सा समाचार नामक अख़बार में काम करने लगे। यहाँ वे अँग्रेज़ी जानने वाले एकमात्र व्यक्ति थे, सो 1903 में अख़बार ने उन्हें लन्दन में अपना सम्वाददाता बनाने का प्रस्ताव रखा, जो चुकोवस्की ने स्वीकार कर लिया। प्रकाशक ने उन्हें सौ रूबल महीने की बढ़िया तनख्वाह देने का वायदा किया था। अपनी नवविवाहित पत्नी को भी वे अपने साथ लन्दन ले गए। लन्दन से भेजे उनके लेख अदेस्सा और कियेव के कुछ अख़बारों में छपते थे। लेकिन रूस से उन्हें अपना वेतन अनियमित रूप से मिलता था और जल्दी ही उन्हें वेतन मिलना बिलकुल ही बन्द हो गया। गर्भवती पत्नी को उन्हें वापिस अदेस्सा भेजना पड़ा। वे ख़ुद कुछ समय तक ब्रिटिश म्यूज़ियम में कैटलागों की नकल करके अपना गुज़ारा चलाते रहे, इसके साथ ही मौक़े का पूरा फ़ायदा उठाते हुए और अँग्रेज़ी साहित्य पढ़ते हुए वे कुछ न कुछ लिखते भी रहे। दोपहर में वे खाना खाने नहीं जाते थे क्योंकि उनके पास इतने  पैसे ही नहीं होते थे कि वे दो समय नियमित रूप से भोजन कर सकें। 1904 में जब रूस से उन्हें लेखक अन्तोन चेख़फ़ की मृत्यु का समाचार मिला तो वे सारी रात बिलख-बिलख कर रोते रहे।

लन्दन में चुकोवस्की ने अपनी अँग्रेज़ी सुधारी और ब्रिटेन के जाने-माने लेखकों से मुलाक़ात की, जिनमें जासूस शर्लक होम्स के सर्जक आर्थर कॉनन डॉयल तथा सुविख्यात विज्ञान-कथा लेखक हर्बर्ट वेल्स भी थे। 1904 में स्वदेश लौटकर चुकोवस्की रूस की तत्कालीन राजधानी साँक्त पितेरबुर्ग में रहने लगे। अब वे अँग्रेज़ी से अनुवाद करने लगे थे। अमरीकी कवि वाल्ट व्हिटमैन की कविताओं के उनके द्वारा किए गए अनुवाद रूस में बेहद लोकप्रिय हुए। पितेरबुर्ग की पत्र-पत्रिकाओं में उनके लेख भी छपने लगे। साहित्य जगत में उन्हें एक गम्भीर समीक्षक और आलोचक के रूप में मान्यता मिली। और धीरे-धीरे  उनका परिचय उस समय के सभी प्रसिद्ध रूसी लेखकों-कवियों और कलाकारों से हो गया। बाद में उन्होंने अपने संस्मरणों में उनका बड़ा सजीव चित्रण किया।

उन दिनों कोई सोच भी नहीं सकता था कि चुकोवस्की बच्चों के लिए लिखने वाले एक प्रसिद्ध लेखक बन जाएँगे।  1908 में उन्होंने  अपने समसामयिक लेखकों के बारे में एक लेख-माला लिखी। चुकोवस्की ने अपने संस्मरणों में उस समय का ज़िक्र करते हुए लिखा -- यदि कोई मुझसे तब कहता कि मेरा नाम बच्चों के लिए लिखने वाले लेखकों में गिना जाएगा तो मैं इसे शायद अपना अपमान समझता क्योंकि नन्हे बच्चों के लिए पुस्तकें ज़्यादातर ऐसे लोग लिखते थे जो चालू काम करना ही जानते थे, और जिनमें किसी तरह की कोई प्रतिभा नहीं होती थी।
प्रथम विश्वयुद्ध के दिनों में चुकोवस्की ने ब्रिटेन, फ़्राँस और बेल्जियम में एक रूसी अख़बार के सम्वाददाता के रूप में काम किया। 1917 में स्वदेश लौटने पर मक्सीम गोर्की के कहने पर उन्होंने ‘पारुस’  यानी ’बादबान’ नामक प्रकाशनगृह में बाल-साहित्य विभाग का कार्यभार संभाल लिया। उन्हीं दिनों वे इस बात पर भी ध्यान देने लगे कि नन्हे बच्चे किस तरह अपनी मातृभाषा के नए-नए शब्दों को अपनाते हैं और उनका अपने ढंग से उपयोग करते हैं। इन उपयोगों को वे अपने पास लिख कर रखने लगे और फिर यह काम उन्होंने सारी उम्र जारी रखा। उनके इन नोटों से ही बनी  है उनकी एक सबसे लोकप्रिय किताब -- ’दो से पांच तक’। इस किताब के अभी तक कुल के 21 संस्करण निकल चुके हैं।
 
कर्नेय चुकोवस्की ने जब बच्चों के लिए कविताएँ और कहानियाँ लिखनी शुरू कीं तब तक वे एक मशहूर  आलोचक बन चुके थे।  लेकिन उनके द्वारा लिखा गया बाल साहित्य बच्चों और उनके माता-पिताओं के बीच इतना ज़्यादा लोकप्रिय हुआ कि उन्हें ’बच्चों के प्रिय लेखक’ के रूप में मान्यता मिल गई। आइए, हम आपको बताएँ कि वे आखिर बाल-लेखक बने कैसे? एक बार चुकोवस्की को बच्चों के लिए एक कथा-संग्रह तैयार करने का काम सौंपा गया। यों तो यह काम मात्र सम्पादकीय काम था, पर इसी की बदौलत एक नए लेखक का जन्म हुआ। इस संग्रह के लिए उन्होंने कुछ बालकथाएँ लिखीं, जिन्हें पाठकों और समीक्षकों ने ख़ूब सराहा। फिर मक्सीम गोर्की ने जब बाल-साहित्य का एक और संकलन छापने का फैसला किया तो उन्होंने चुकोवस्की से अनुरोध किया कि वे उस संकलन के लिए भी कोई बाल-कविता लिख दें। चुकोवस्की बहुत असमंजस में पड़ गए। वे यह सोचकर परेशान थे कि वे ऐसा नहीं कर पाएँगे। इससे पहले उन्होंंने कभी कोई कविता नहीं लिखी थी। लेकिन एक संयोग ऐसा बना कि उनकी यह कठिनाई दूर हो गई।
अपने बीमार नन्हें बेटे के साथ वह ट्रेन में पितेरबुर्ग वापिस लौट रहे थे। कि  रेल की छुकछुक की ताल पर वह बेटे को एक कहानी बनाकर सुनाने लगे -- मगरमच्छ एक, था बड़ा नेक, चिड़ियाघर में था बन्द, और हो गया था तंग, एक दिन आया ऐसा, वो भागा चिड़ियाघर से...। उनका बेटा बड़े ध्यान से उनकी यह कहानी सुन रहा था। फिर कई दिन बीत गए। चुकोवस्की  यह भूल गए थे कि उन्होंने अपने  बच्चे को कोई कहानी सुनाई थी। पर बेटे को वह कहानी ज़ुबानी याद हो गई थी। इस तरह बनी कर्नेई चुकोवस्की की पहली बाल काव्य-कथा -- मगरमच्छ।  1917 में यह रचना प्रकाशित हुई और तुरन्त ही चुकोवस्की बच्चों के चहेते लेखक बन गए।

चुकोवस्की की कविताएँ एकदम जीवन्त होती हैं। एकदम जीती-जागती। उनमें अपनी ख़ासियत, अपना  अनूठापन होती है। उनकी कविता में तुक बड़ी आसानी से मिलती है, और ताल भी कहीं डगमगाती नहीं। इसीलिए वह बच्चों को तुरन्त ही याद हो जाती है। ’मगरमच्छ’ के बाद उनकी नई-नई कविताएँ छपने लगीं। 1924 में उन्होंने ’एक पेड़ न्यारा’ नामक कविता लिखी। यह कविता उन्होंने  अपनी उस बिटिया को समर्पित की थी जिसे उसके बचपन में ही तपेदिक के कारण मौत लील गई थी।
चुकोवस्की बच्चों के लिए विश्व साहित्य की सर्वश्रेष्ठ रचनाओं का अनुवाद भी करने लगे। उस ज़माने के सबसे अच्छे चित्रकार उनकी पुस्तकों के लिए चित्र बनाते थे, इसलिए उनकी रचनाएँ  और भी अधिक आकर्षक लगती थीं। मास्को से थोड़ी दूर एक छोटी देहाती बस्ती में चुकोवस्की ने अपना मकान बना लिया। द्वितीय विश्वयुद्ध में के बाद इस मकान में वे अक्सर अनाथ हो गए बच्चों के लिए उत्सवों का आयोजन करते थे। वे जानते थे कि बच्चों को ख़ुश रखना कितना ज़रूरी है। उनके इन उत्सवों में कभी-कभी तो डेढ़ हज़ार तक बच्चे भाग लेते थे।

1969 में चुकोवस्की का देहान्त हो गया। जिस मकान में वे रहते थे, उसे संग्रहालय बना दिया गया। आज भी यहाँ बच्चों-बड़ों का ताँता लगा रहता है। जैसा कि हमने शुरू में बताया -- चुकोवस्की को रूस का बच्चा-बच्चा जानता है। किण्डरगार्टन या स्कूल में बच्चों का कोई भी समारोह ऐसा नहीं होता, जिसमें चुकोवस्की की कविताएँ न पढ़ी जाती हों।
लीजिए, आपके लिए प्रस्तुत हैं उनकी कुछ कविताएँ।

मुर्गी

मुर्गी पाली प्यारी-प्यारी,
थी वह मुर्गी बिलकुल न्यारी ।
कपड़े सीती, खाना पकाती,

बढ़िया-बढ़िया केक बनाती।
काम-काज निबटा के सारे,
बैठ जाती वह घर के द्वारे ।

नया-नया फिर गाना गाती,
मज़ेदार कहानी सुनाती ।


मेंढकी और बगुला

मेंढकी को हुआ बुखार
हाय, इतना तेज़ बुखार !
बगुला झट से उड़ आया,
बोला: दवा मैं तेरी लाया ।
मुझसे बिलकुल न डर,
सबसे बड़ा मैं डाक्टर ।
आ, आजा मेरे पास,
दवा दूँगा तुझे मैं ख़ास ।
मेंढकी पास आ गई,
और अपनी जान गवाँ गई ।

एक पेड़ न्यारा

आँगन हमारा
सबसे न्यारा,
उगता इसमें पेड़
देता नहीं वह बेर,
न कोई फूल,
न कोई पत्ता,
जूतियों से है लदा ।
चप्पलें उस पर उगतीं,
उगते सेण्डल, उगते बूट ।
माँ बगीचे से आई,
रंग-बिरंगे सेण्डल लाई,
लाली के लिए लाल,
रानो के लिए पीले
मुनिया नन्ही तू भी ले
ऊनी जूतियाँ गरम
मुन्ने राजा के लिए
लाए पापा जूते नरम
जुराबें भी साथ में गरम ।
देता है यह सब पेड़ हमारा !
ऐसा है वह न्यारा-न्यारा !
अरे, क्यों यों घूमते हो,
फटे जूते, नंगे पाँव ?
देखो ज़रा, लदा है पेड़
पक गई जूतियाँ,
आई चप्पलों की बहार,
सैण्डलों की है भरमार !
अरे, ले लो जूतियाँ,
चप्पलें ले लो,
दे रहा है -
हमारा पेड़ न्यारा |

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